🚩 जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
📜 गोस्वामी तुलसीदास कृत

॥ श्री हनुमान चालीसा ॥

भावार्थ सहित सम्पूर्ण पाठ, भक्तिमय ऑडियो एवं 108 डिजिटल जाप माला काउंटर

ॐ श्री हनुमते नमः

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॥ दोहा ॥
दोहा १
श्रीगुरु चरन सरोज रज, निज मनु मुकुरु सुधारि।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
Shri Guru Charan Saroj Raj, Nij Manu Mukuru Sudhari.
Barnau Raghuvar Bimal Jasu, Jo Dayaku Phal Chari.

भावार्थ: श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके, मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों फल देने वाला है।

दोहा २
बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन-कुमार।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस विकार॥
Buddhiheen Tanu Janike, Sumirau Pavan Kumar.
Bal Buddhi Vidya Dehu Mohi, Harahu Kalesh Vikaar.

भावार्थ: हे पवनपुत्र! मैं स्वयं को बुद्धिहीन जानकर आपका स्मरण करता हूँ। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि और विद्या प्रदान करें तथा मेरे समस्त कष्टों, दुःखों एवं विकारों को दूर करें।

॥ चौपाई ॥
१
जय हनुमान ज्ञान गुन सागर।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥

भावार्थ: हे ज्ञान और गुणों के अगाध सागर श्री हनुमान जी, आपकी जय हो! हे वानरराज, आपकी कीर्ति तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में प्रकाशमान है।

२
राम दूत अतुलित बल धामा।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥

भावार्थ: आप मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अनन्य दूत और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप माता अंजना के पुत्र हैं और 'पवनसुत' के पावन नाम से जाने जाते हैं।

३
महावीर विक्रम बजरंगी।
कुमति निवार सुमति के संगी॥

भावार्थ: हे महान वीर, आप अत्यंत पराक्रमी और वज्र के समान सुदृढ़ अंगों वाले हैं। आप कुबुद्धि (दुर्विचारों) को नष्ट करने वाले और सद्बुद्धि देने वालों के साथी हैं।

४
कंचन बरन बिराज सुबेसा।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥

भावार्थ: आपका वर्ण सुवर्ण (सोने) के समान तेजस्वी है और आप सुंदर वस्त्रों से सुशोभित हैं। आपके कानों में दिव्य कुंडल और घुंघराले बाल शोभायमान हैं।

५
हाथ वज्र औ ध्वजा बिराजे।
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥

भावार्थ: आपके एक हाथ में वज्र और दूसरे हाथ में धर्म-ध्वजा सुशोभित है। आपके कंधे पर पवित्र मूंज का जनेऊ विराजित है।

६
संकर सुवन केसरी नंदन।
तेज प्रताप महा जग वंदन॥

भावार्थ: आप भगवान शिव के रुद्रावतार और महाराज केसरी के पुत्र हैं। आपके अलौकिक तेज और पराक्रम की वंदना समस्त संसार करता है।

७
विद्यावान गुनी अति चातुर।
राम काज करिबे को आतुर॥

भावार्थ: आप समस्त विद्याओं के ज्ञाता, परम गुणी और अत्यंत चतुर हैं। भगवान श्री राम के प्रत्येक कार्य को सिद्ध करने के लिए आप सदैव तत्पर रहते हैं।

८
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया।
राम लखन सीता मन बसिया॥

भावार्थ: आप प्रभु श्री राम की पावन कथा सुनने के परम रसिक हैं। आपके हृदय में भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी सदैव वास करते हैं।

९
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा।
विकट रूप धरि लंक जरावा॥

भावार्थ: आपने अशोक वाटिका में माता जानकी को अति सूक्ष्म रूप में दर्शन दिए, और विकराल रूप धारण करके दुष्ट रावण की स्वर्ण लंका को भस्म कर दिया।

१०
भीम रूप धरि असुर संहारे।
रामचंद्र के काज संवारे॥

भावार्थ: आपने विशाल भीमकाय रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और भगवान श्री रामचंद्र जी के समस्त कार्यों को संवारा।

११
लाय सजीवन लखन जियाए।
श्रीरघुवीर हरषि उर लाए॥

भावार्थ: आपने द्रोणागिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की, जिससे प्रसन्न होकर श्री रघुवीर ने आपको हृदय से लगा लिया।

१२
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥

भावार्थ: श्री राम जी ने आपकी अपार प्रशंसा करते हुए कहा कि हे हनुमान! तुम मुझे मेरे प्रिय भाई भरत के समान ही अत्यंत प्रिय हो।

१३
सहस बदन तुम्हरो जस गावैं।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥

भावार्थ: 'हजारों मुखों वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाते हैं'—ऐसा कहकर भगवान श्री राम ने आपको पुनः प्रेमपूर्वक अपने कंठ से लगा लिया।

१४
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा।
नारद सारद सहित अहीसा॥

भावार्थ: सनक, सनंदन आदि ऋषि, ब्रह्मादि देवता, मुनीश्वर, देवर्षि नारद, माता सरस्वती और शेषनाग सभी आपके गुणों का गान करते हैं।

१५
जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥

भावार्थ: यमराज, कुबेर और दसों दिशाओं के रक्षक दिगपाल जब आपकी महिमा का पार नहीं पा सकते, तो साधारण कवि या विद्वान आपकी कीर्ति का पूर्ण वर्णन कैसे कर सकते हैं!

१६
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा।
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥

भावार्थ: आपने सुग्रीव को भगवान श्री राम से मिलाकर और उन्हें किष्किंधा का राज्यपद दिलवाकर उन पर महान उपकार किया।

१७
तुम्हरो मंत्र विभीषण माना।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥

भावार्थ: विभीषण ने आपके परामर्श और उपदेश को स्वीकार किया, जिसके फलस्वरूप वे लंका के राजा (लंकेश्वर) बने, यह सारा संसार जानता है।

१८
जुग सहस्र योजन पर भानू।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥

भावार्थ: जो सूर्य हजारों योजन की दूरी पर स्थित हैं, उन्हें आपने बाल्यकाल में मीठा फल समझकर एक ही छलांग में निगल लिया था।

१९
प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माही।
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥

भावार्थ: भगवान श्री राम की मुद्रिका (अंगूठी) को मुख में रखकर आपने अथाह समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।

२०
दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥

भावार्थ: इस संसार में जितने भी कठिन व असंभव कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा-दृष्टि मात्र से अत्यंत सरल व सुगम हो जाते हैं।

२१
राम दुआरे तुम रखवारे।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥

भावार्थ: श्री राम के दरबार के आप मुख्य द्वारपाल हैं। आपकी आज्ञा या कृपा के बिना कोई भी प्रभु के धाम में प्रवेश नहीं पा सकता।

२२
सब सुख लहै तुम्हारी सरना।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥

भावार्थ: आपकी शरण में आने वाले को संसार के समस्त सुख प्राप्त होते हैं। जब आप रक्षक हैं, तो किसी भी संकट या शत्रु का भय नहीं रहता।

२३
आपन तेज सम्हारो आपै।
तीनों लोक हाँक ते काँपै॥

भावार्थ: आपके असीम तेज और वेग को केवल आप ही संभाल सकते हैं। आपकी एक भीषण हुंकार से तीनों लोक थर-थर कांप उठते हैं।

२४
भूत पिशाच निकट नहि आवै।
महावीर जब नाम सुनावै॥

भावार्थ: जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम उच्चारण किया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच, प्रेत और नकारात्मक शक्तियां पास भी नहीं फटकतीं।

२५
नासै रोग हरै सब पीरा।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

भावार्थ: जो व्यक्ति निरंतर वीर हनुमान जी के नाम का जप करता है, उसके समस्त असाध्य रोग नष्ट हो जाते हैं और सारी पीड़ाएं समाप्त हो जाती हैं।

२६
संकट तें हनुमान छुड़ावै।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥

भावार्थ: जो भी मनुष्य मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, हनुमान जी उसे जीवन के प्रत्येक संकट से मुक्त कर देते हैं।

२७
सब पर राम तपस्वी राजा।
तिन के काज सकल तुम साजा॥

भावार्थ: तपस्वी राजा श्री रामचंद्र जी सर्वश्रेष्ठ प्रभु हैं, और आपने उनके समस्त कठिन कार्यों को अत्यंत कुशलता से सिद्ध किया।

२८
और मनोरथ जो कोई लावै।
सोई अमित जीवन फल पावै॥

भावार्थ: जो भक्त आपके सम्मुख अपनी कोई भी अभिलाषा या मनोरथ लेकर आता है, उसे ऐसा अनंत और अविनाशी फल प्राप्त होता है जिसकी कोई सीमा नहीं।

२९
चारों जुग परताप तुम्हारा।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥

भावार्थ: आपका प्रताप सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग—चारों युगों में फैला हुआ है। आपका यश संपूर्ण ब्रह्मांड में सूर्य के समान प्रकाशमान है।

३०
साधु संत के तुम रखवारे।
असुर निकंदन राम दुलारे॥

भावार्थ: आप साधु-संतों व सज्जनों के रक्षक हैं, दुष्ट असुरों का संहार करने वाले हैं और भगवान श्री राम के प्राणप्रिय दुलारे हैं।

३१
अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता।
अस बर दीन जानकी माता॥

भावार्थ: आपको माता जानकी ने ऐसा वरदान दिया है कि आप अपने भक्तों को आठों सिद्धियां (अणिमा, महिमा आदि) और नौ निधियां प्रदान करने में समर्थ हैं।

३२
राम रसायन तुम्हरे पासा।
सदा रहो रघुपति के दासा॥

भावार्थ: आपके पास श्री राम नाम रूपी परम औषधि (रसायन) है। आप सदैव भगवान श्री रघुपति के अनन्य सेवक और दास बने रहते हैं।

३३
तुम्हरे भजन राम को पावै।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥

भावार्थ: आपके भजन और स्मरण से साधक को भगवान श्री राम की प्राप्ति होती है, और उसके जन्म-जन्मांतर के संचित दुःख व कष्ट विलीन हो जाते हैं।

३४
अंतकाल रघुवर पुर जाई।
जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥

भावार्थ: आपकी कृपा से जीव अंत समय में श्री राम के परम धाम (साकेत लोक) को जाता है, और यदि पुनर्जन्म भी ले तो वह 'हरि-भक्त' कहलाता है।

३५
और देवता चित्त न धरई।
हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥

भावार्थ: अन्य किसी देवी-देवता का ध्यान न धरते हुए भी, केवल एकमात्र श्री हनुमान जी की सेवा-उपासना से सभी सुख और परम आनंद प्राप्त हो जाते हैं।

३६
संकट कटै मिटै सब पीरा।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥

भावार्थ: जो भी व्यक्ति महाबली वीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके सारे संकट कट जाते हैं और समस्त शारीरिक व मानसिक पीड़ाएं मिट जाती हैं।

३७
जय जय जय हनुमान गोसाईं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥

भावार्थ: हे स्वामी श्री हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ पर परम कृपालु गुरुदेव की तरह अपनी अनुकंपा और कृपा बनाए रखें।

३८
जो शत बार पाठ कर कोई।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥

भावार्थ: जो मनुष्य सौ (100) बार इस चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, वह सांसारिक बंधनों और संकटों से छूटकर परम सुख प्राप्त करता है।

३९
जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥

भावार्थ: जो व्यक्ति इस हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करता है, उसे सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है, इसके साक्षात साक्षी स्वयं भगवान शिव (गौरीश) हैं।

४०
तुलसीदास सदा हरि चेरा।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥

भावार्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि वे सदैव भगवान श्री हरि के सेवक हैं। हे नाथ! आप सदा-सर्वदा के लिए मेरे हृदय में अपना स्थायी वास कीजिए।

॥ समापन दोहा ॥
समापन
पवन तनय संकट हरन, मंगल मूरति रूप।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
Pavan Tanay Sankat Haran, Mangal Murati Roop.
Ram Lakhan Sita Sahit, Hriday Basahu Sur Bhoop.

भावार्थ: हे पवनपुत्र! हे संकट मोचन! हे सर्वमंगल स्वरूप! हे देवों के ईश! आप भगवान श्री राम, भ्राता लक्ष्मण और माता जानकी सहित सदैव मेरे हृदय मंदिर में निवास करें।