॥ श्री हनुमान चालीसा ॥
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📿 डिजिटल जाप माला काउंटर (108 Chanting Counter)
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बरनउँ रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि॥
Barnau Raghuvar Bimal Jasu, Jo Dayaku Phal Chari.
भावार्थ: श्री गुरु महाराज के चरण कमलों की धूलि से अपने मन रूपी दर्पण को पवित्र करके, मैं श्री रघुवीर के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूँ, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चारों फल देने वाला है।
बल बुद्धि विद्या देहु मोहि, हरहु कलेस विकार॥
Bal Buddhi Vidya Dehu Mohi, Harahu Kalesh Vikaar.
भावार्थ: हे पवनपुत्र! मैं स्वयं को बुद्धिहीन जानकर आपका स्मरण करता हूँ। मुझे शारीरिक बल, सद्बुद्धि और विद्या प्रदान करें तथा मेरे समस्त कष्टों, दुःखों एवं विकारों को दूर करें।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर॥
भावार्थ: हे ज्ञान और गुणों के अगाध सागर श्री हनुमान जी, आपकी जय हो! हे वानरराज, आपकी कीर्ति तीनों लोकों (स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल) में प्रकाशमान है।
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा॥
भावार्थ: आप मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के अनन्य दूत और अतुलनीय बल के धाम हैं। आप माता अंजना के पुत्र हैं और 'पवनसुत' के पावन नाम से जाने जाते हैं।
कुमति निवार सुमति के संगी॥
भावार्थ: हे महान वीर, आप अत्यंत पराक्रमी और वज्र के समान सुदृढ़ अंगों वाले हैं। आप कुबुद्धि (दुर्विचारों) को नष्ट करने वाले और सद्बुद्धि देने वालों के साथी हैं।
कानन कुंडल कुंचित केसा॥
भावार्थ: आपका वर्ण सुवर्ण (सोने) के समान तेजस्वी है और आप सुंदर वस्त्रों से सुशोभित हैं। आपके कानों में दिव्य कुंडल और घुंघराले बाल शोभायमान हैं।
काँधे मूँज जनेऊ साजे॥
भावार्थ: आपके एक हाथ में वज्र और दूसरे हाथ में धर्म-ध्वजा सुशोभित है। आपके कंधे पर पवित्र मूंज का जनेऊ विराजित है।
तेज प्रताप महा जग वंदन॥
भावार्थ: आप भगवान शिव के रुद्रावतार और महाराज केसरी के पुत्र हैं। आपके अलौकिक तेज और पराक्रम की वंदना समस्त संसार करता है।
राम काज करिबे को आतुर॥
भावार्थ: आप समस्त विद्याओं के ज्ञाता, परम गुणी और अत्यंत चतुर हैं। भगवान श्री राम के प्रत्येक कार्य को सिद्ध करने के लिए आप सदैव तत्पर रहते हैं।
राम लखन सीता मन बसिया॥
भावार्थ: आप प्रभु श्री राम की पावन कथा सुनने के परम रसिक हैं। आपके हृदय में भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी सदैव वास करते हैं।
विकट रूप धरि लंक जरावा॥
भावार्थ: आपने अशोक वाटिका में माता जानकी को अति सूक्ष्म रूप में दर्शन दिए, और विकराल रूप धारण करके दुष्ट रावण की स्वर्ण लंका को भस्म कर दिया।
रामचंद्र के काज संवारे॥
भावार्थ: आपने विशाल भीमकाय रूप धारण करके राक्षसों का संहार किया और भगवान श्री रामचंद्र जी के समस्त कार्यों को संवारा।
श्रीरघुवीर हरषि उर लाए॥
भावार्थ: आपने द्रोणागिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लाकर लक्ष्मण जी के प्राणों की रक्षा की, जिससे प्रसन्न होकर श्री रघुवीर ने आपको हृदय से लगा लिया।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
भावार्थ: श्री राम जी ने आपकी अपार प्रशंसा करते हुए कहा कि हे हनुमान! तुम मुझे मेरे प्रिय भाई भरत के समान ही अत्यंत प्रिय हो।
अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं॥
भावार्थ: 'हजारों मुखों वाले शेषनाग भी तुम्हारा यश गाते हैं'—ऐसा कहकर भगवान श्री राम ने आपको पुनः प्रेमपूर्वक अपने कंठ से लगा लिया।
नारद सारद सहित अहीसा॥
भावार्थ: सनक, सनंदन आदि ऋषि, ब्रह्मादि देवता, मुनीश्वर, देवर्षि नारद, माता सरस्वती और शेषनाग सभी आपके गुणों का गान करते हैं।
कवि कोविद कहि सके कहाँ ते॥
भावार्थ: यमराज, कुबेर और दसों दिशाओं के रक्षक दिगपाल जब आपकी महिमा का पार नहीं पा सकते, तो साधारण कवि या विद्वान आपकी कीर्ति का पूर्ण वर्णन कैसे कर सकते हैं!
राम मिलाय राज पद दीन्हा॥
भावार्थ: आपने सुग्रीव को भगवान श्री राम से मिलाकर और उन्हें किष्किंधा का राज्यपद दिलवाकर उन पर महान उपकार किया।
लंकेश्वर भए सब जग जाना॥
भावार्थ: विभीषण ने आपके परामर्श और उपदेश को स्वीकार किया, जिसके फलस्वरूप वे लंका के राजा (लंकेश्वर) बने, यह सारा संसार जानता है।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
भावार्थ: जो सूर्य हजारों योजन की दूरी पर स्थित हैं, उन्हें आपने बाल्यकाल में मीठा फल समझकर एक ही छलांग में निगल लिया था।
जलधि लाँघि गए अचरज नाही॥
भावार्थ: भगवान श्री राम की मुद्रिका (अंगूठी) को मुख में रखकर आपने अथाह समुद्र को लांघ लिया, इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते॥
भावार्थ: इस संसार में जितने भी कठिन व असंभव कार्य हैं, वे सब आपकी कृपा-दृष्टि मात्र से अत्यंत सरल व सुगम हो जाते हैं।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे॥
भावार्थ: श्री राम के दरबार के आप मुख्य द्वारपाल हैं। आपकी आज्ञा या कृपा के बिना कोई भी प्रभु के धाम में प्रवेश नहीं पा सकता।
तुम रक्षक काहू को डर ना॥
भावार्थ: आपकी शरण में आने वाले को संसार के समस्त सुख प्राप्त होते हैं। जब आप रक्षक हैं, तो किसी भी संकट या शत्रु का भय नहीं रहता।
तीनों लोक हाँक ते काँपै॥
भावार्थ: आपके असीम तेज और वेग को केवल आप ही संभाल सकते हैं। आपकी एक भीषण हुंकार से तीनों लोक थर-थर कांप उठते हैं।
महावीर जब नाम सुनावै॥
भावार्थ: जहाँ महावीर हनुमान जी का नाम उच्चारण किया जाता है, वहाँ भूत, पिशाच, प्रेत और नकारात्मक शक्तियां पास भी नहीं फटकतीं।
जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
भावार्थ: जो व्यक्ति निरंतर वीर हनुमान जी के नाम का जप करता है, उसके समस्त असाध्य रोग नष्ट हो जाते हैं और सारी पीड़ाएं समाप्त हो जाती हैं।
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥
भावार्थ: जो भी मनुष्य मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, हनुमान जी उसे जीवन के प्रत्येक संकट से मुक्त कर देते हैं।
तिन के काज सकल तुम साजा॥
भावार्थ: तपस्वी राजा श्री रामचंद्र जी सर्वश्रेष्ठ प्रभु हैं, और आपने उनके समस्त कठिन कार्यों को अत्यंत कुशलता से सिद्ध किया।
सोई अमित जीवन फल पावै॥
भावार्थ: जो भक्त आपके सम्मुख अपनी कोई भी अभिलाषा या मनोरथ लेकर आता है, उसे ऐसा अनंत और अविनाशी फल प्राप्त होता है जिसकी कोई सीमा नहीं।
है परसिद्ध जगत उजियारा॥
भावार्थ: आपका प्रताप सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग—चारों युगों में फैला हुआ है। आपका यश संपूर्ण ब्रह्मांड में सूर्य के समान प्रकाशमान है।
असुर निकंदन राम दुलारे॥
भावार्थ: आप साधु-संतों व सज्जनों के रक्षक हैं, दुष्ट असुरों का संहार करने वाले हैं और भगवान श्री राम के प्राणप्रिय दुलारे हैं।
अस बर दीन जानकी माता॥
भावार्थ: आपको माता जानकी ने ऐसा वरदान दिया है कि आप अपने भक्तों को आठों सिद्धियां (अणिमा, महिमा आदि) और नौ निधियां प्रदान करने में समर्थ हैं।
सदा रहो रघुपति के दासा॥
भावार्थ: आपके पास श्री राम नाम रूपी परम औषधि (रसायन) है। आप सदैव भगवान श्री रघुपति के अनन्य सेवक और दास बने रहते हैं।
जनम जनम के दुख बिसरावै॥
भावार्थ: आपके भजन और स्मरण से साधक को भगवान श्री राम की प्राप्ति होती है, और उसके जन्म-जन्मांतर के संचित दुःख व कष्ट विलीन हो जाते हैं।
जहाँ जन्म हरि भक्त कहाई॥
भावार्थ: आपकी कृपा से जीव अंत समय में श्री राम के परम धाम (साकेत लोक) को जाता है, और यदि पुनर्जन्म भी ले तो वह 'हरि-भक्त' कहलाता है।
हनुमत सेइ सर्व सुख करई॥
भावार्थ: अन्य किसी देवी-देवता का ध्यान न धरते हुए भी, केवल एकमात्र श्री हनुमान जी की सेवा-उपासना से सभी सुख और परम आनंद प्राप्त हो जाते हैं।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा॥
भावार्थ: जो भी व्यक्ति महाबली वीर हनुमान जी का स्मरण करता है, उसके सारे संकट कट जाते हैं और समस्त शारीरिक व मानसिक पीड़ाएं मिट जाती हैं।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं॥
भावार्थ: हे स्वामी श्री हनुमान जी! आपकी जय हो, जय हो, जय हो! आप मुझ पर परम कृपालु गुरुदेव की तरह अपनी अनुकंपा और कृपा बनाए रखें।
छूटहि बंदि महा सुख होई॥
भावार्थ: जो मनुष्य सौ (100) बार इस चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करता है, वह सांसारिक बंधनों और संकटों से छूटकर परम सुख प्राप्त करता है।
होय सिद्धि साखी गौरीसा॥
भावार्थ: जो व्यक्ति इस हनुमान चालीसा का नित्य पाठ करता है, उसे सभी कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है, इसके साक्षात साक्षी स्वयं भगवान शिव (गौरीश) हैं।
कीजै नाथ हृदय मह डेरा॥
भावार्थ: गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि वे सदैव भगवान श्री हरि के सेवक हैं। हे नाथ! आप सदा-सर्वदा के लिए मेरे हृदय में अपना स्थायी वास कीजिए।
राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप॥
Ram Lakhan Sita Sahit, Hriday Basahu Sur Bhoop.
भावार्थ: हे पवनपुत्र! हे संकट मोचन! हे सर्वमंगल स्वरूप! हे देवों के ईश! आप भगवान श्री राम, भ्राता लक्ष्मण और माता जानकी सहित सदैव मेरे हृदय मंदिर में निवास करें।